शनिवार, 4 मई 2013

व्यवहारिकता मनोविज्ञानिक

व्यवहारिकता


           मनोवैज्ञानिक Psychological कर्मो की नो प्रकार की गतिविधियों का वर्णनात्मक स्वरूप
  मानव जीवन में कर्म को नो प्रकार से करने पर  सफलता अवश्य मिलती है . जिसका वर्णन भक्ति मार्ग में नवदा भक्ति [ नो प्रकार के कर्म ] करने से इस सांसारिक गतिविधियों में इस शरीर और आत्मा का होना सफलतापूर्वक जीवनशैली को चलाया जा सकता है .इन्सान के चेतन अवस्था के नो स्वरूपों से जीवन यापन किया जाता है ,जीवन यापन भी एक भक्ति है ,और इस सांसारिक जीवन जीने की कला को हैंस और इस पिंड से आत्मा का ज्ञान परमहंस कहलाता है . जो नो रास्तों से [ माध्यम ] से सफल बनाया जा सकता है .
 [ 1 ] श्रवण कर्म - किसी भी ज्ञान को चेतन अवस्था से कानों से श्रवण करना चाहिए .जो आप कोई बात अच्छी तरह सुन लेंगे तो उस बात को समझ भी सकते है , जो आप एक पूरा श्रवण ज्ञान हुआ .
 [ 2 ] कीर्तन कर्म - जब आप किसी बात को सुन लिया है तो अब आप उस बात को अपने मुँह से बखान ,गुणगान यश को बता सकते है .
 [ 3 ] स्मरण कर्म - जब आप किसी बात को बखान अपनी बुद्धि से स्मरण या याद कर सकेंगे .
 [ 4 ] पाद - सेवन कर्म - छोटे से छोटे रूप व असुंदर तो उपयोग ले सकेंगे  [ जैसे भगवान का चेहरा की बजाय उन के पावो पर ही नजर , तर्क वितर्क से बचना ].
 [ 5 ] अर्चन कर्म - सत्कार से उस कर्म की रुचि पूर्वक करना ही अर्चन है.
 [ ६  ] वंदन कर्म - किसी भी कर्म की प्रमाण स्तुति करना ही वंदन कहलाता है .
 [ 7 ] दास्य कर्म - किसी भी कर्म का निम्न बनकर  सेवक यानि जैसे उस का दास हो .
 [ ८ ] सख्य कर्म -  किसी भी कर्म को सखापन , मित्रता पूर्वक करना .
 [ ९ ] आत्म-समर्पण कर्म - किसी भी कर्म को आत्मा से लींन  होकर ,समर्पित होकर करना  . इस प्रकार जो भी कर्म मनुष्य करता है तो धरती पर कोई कर्म ऐसा नही जिस सफलता का संदेह हो ..ज़रूर ज़रुर सकारात्मक सफलता अवश्य मिलती है .
       नौ कर्म में श्रवण कर्म की भूमिका = प्रति एक व्यक्ति का अपना अपना मनोविज्ञान होता है उस सभी की चेतन अवस्था की क्रिया शीलता का अध्ययन अलग अलग होता है ,दो रेलवे कर्म चारी आपस में बाते करते है , पहला गाड़ी रो को मत, जाने दो .और दुसया समझता की गाड़ी रोको , मत जाने दो ! तो दोनों में विरोधाभास हो जायेगा . कारण की पहले वाले ने तो कहा की गाड़ी रो को मत, जाने दो ! जो रोको मत के बाद रुक कर बोल रहा है की गाड़ी को जाने दो . परन्तु इधर दूसरा सुन रहा की, गाड़ी रोको , मत जाने दो !मतलब गलत ही निकाल रहा की मत जाने दो [ लिखने वाले और पढने वाले को भी समझना जरूरी की पूरे वाक्यांशों कैसे बोला या  लिखा गया . [ 1 ] गाड़ी रो को मत, जाने दो =  [ 2 ] गाड़ी रो को, मत जाने दो. बोलने वाले और सुनने वाले में विरोधाभास होने का ये कारण होता की सुनने वाले के विचारों की गति अधिक या कम हो सकती है .जिसके कारण दैनिक जीवन मे कलह ,धुटन ,हार या असफलताओं का कारण होता .समझ इसी में की दोबारा वार्तालाप सुने या पढ़े .
      नौ कर्मो में कीर्तन कर्म का महत्व = हम किसी संज्ञा का [ विषय का ] बखान या गुणगान कब करते की जब तक उस के बारे में हमने सही ढंग सुना हो तब .अगर आप नें आम को देख तो लिया है परन्तु उस के गुणगान सुनें ही नही तो आप दुसरो को कैसे बताएगें की मीठा होता या कडवा, और जब किसी विशेषज्ञ से उस के बारे में सुनेंगे तो आप उस आम के बारे में  बता पाएंगे की ये मीठा आम, रसीला आम हैं. किसी भी कर्म का आप कीर्तन कर्म तब ही कर  पायेगें  जब आप उस के बारे में अच्छी श्रवण क्षमता बनायेगें. अपनी अच्छी श्रवण क्षमता बना ये और कीर्तन कर्म की शोभा बढ़ाएं. चाहे आप व्यापार करो, चाहे परिवार चलाए या कोई प्रस्तुति करण हो उस को गुणगान के महत्वपूर्ण भूमिका रहती हैं .
      नौ काम्य कर्म में स्मरण कर्म की भूमिका = बुद्धि दुआरा याद करना को स्मरण कहते है ,जब चेतन अवस्था में हम किसी बात को सुनते है तो तो उसका वापस कीर्तन करते तो अपनी बुद्धि से याद करके स्मरण करते है ,जिस से याद करने की क्षमता को बढ़ावा मिलता जो शिक्षार्थी के लिए या कमजोर याददास्त वालो को इस प्रकार के अभ्यास से स्मरण शक्ति को बढावा जा सकता है .किसी बात को सुने ध्यान पूर्वक ,फिर उस को बोले कीर्तन [ बखान ] का अभ्यास को स्मरण करे जिस से याददास्त अच्छी बन सकेगी .
      नौ काम्य कर्म में लघु ,शुक्ष्म का उपयोग, पाद सेवन कर्म = किसी भी कर्म प्राय हमारी नज़रे ऊपरी सतह पर ही ठहरती है ,हमे जड तत्व पर भी ध्यान पूर्वक गुण का उपयोग करना चाहिए ,अक्षर हमारी नजर चोटी पर ही जाती है एडी तक नही [ नीचे ], भगवान, पौधे, मनुष्य या पशु सबकी जड़े भिन्न भिन्न प्रकार से होती ,पाद सेवन का अर्थ अपने अहंकार को त्याग कर शुक्ष्म या छिपा ज्ञान को अर्जित करना की वो किस संज्ञा पर टीका है, खड़ा है ,उस का बैक ग्राउंड को ध्यान देना हैं .जिस से आप ज्ञान का विकास हो सके.
      नौ कर्म में अर्चन कर्म का होना = अर्चन कर्म किसी संज्ञा के सत्कार को जानना और उसका पालन करना जैसे किसी मित्र, ग्राहक के आगमन या वस्तु विषय में उसका सत्कार करने से यानी सत्य आकर देना . जैसे फल विक्रेता अपने फल को साफ , सुव्यवस्थित परिभाषित रखना या बताना .संज्ञा की कीमत को जानना .
      वंदन कर्म का जीवन में लागू करना = वंदन का मतलब होता है प्रमाण स्तुति करना जैसे किसी फुल के बारे में बताना की कोन सी किस्म का है, सुगंध कैसी , कीमत कैसी है, उत्पाद कहा होता है .सारे प्रत्यक्षीकरण को लागू करना .
       दास्य कर्म का जीवन में लागू करना = अपने आप को लघु - छोटा बनकर सेवा भाव यानि सेवक बन कर जिस प्रकार माता बच्चे के साथ बच्चा बन कर उस की मांग पूर्ति बिना मांग करती जाए , किसी बीमार को देखने के लिए समय पर नर्स बिना माँगे रोगी को दवाई खाना पीना , मलमूत्र का निष्कासन पर ध्यान देना . ये दास्य कर्म जीवन में लागू होता है .
      सख्य कर्म का जीवन में लागू करना = सखापन या मित्रता पूर्वक संज्ञा के साथ व्यवहार करना विशेष करके मित्र दुःख के दिनों में मददगार होता है अपनी कमाई को संकट में पड़े दोस्त को आधी दे देता कोई  बिना शर्त के .शिक्षा, व्यापार, रिश्ता, संकट का समय .उस समय मित्र भाव होना जरूरी है .
      आत्म समर्पण कर्म जीवन में लागू करना = किसी भी संज्ञा कर्म को करते समय आत्म समर्पण यानि पूरा मन लगाकर करना जैसे अर्जुन को तीर चलते समय निशाने के अलावा कुछ भी नही दिखता ,साँस ,दिमाग और आत्मा के समर्पण आदेश मे ही हो .