रविवार, 28 सितंबर 2014

मनोरोगी का उपचार

किसी नाम शब्द से मन के रोग या मानसिक रोग से मुक्तिबोध कथा !

       एक महिला थी वो अपने पति के नाम से नीरस इसलिए थी की सामुदायिक उसको लोग चिड़ाने लग गये तो, उस महिला के परिवार वालो नें उसकी परेशानी को बताने एक मनोविज्ञानी से परामर्श किया, तब मनोविज्ञानी ने एक अन्य महिला का किस्सा इस प्रकार से सुनाया उस पीड़ित को  ~
       संतोष नाम की एक महिला थी उसके पति का नाम था ठंठलपाल ! परिवार और गाँव में उस औरत संतोष  को लोग चिड़ाना शुरू कर दिया. ये तो ठंठलपाल की औरत हैं, वो ठंठलपाल की औरत हैं, तेरा तो आदमी ठंठलपाल हैं. और वो संतोष दिन प्रतिदिन चिड जाती.  [ आदमी की कमजोरी यह होती की जो चिडता तो लोग उसको चिड़ाते रहते जिससे उस क्रम का विकास होता रहता हैं.]
       लक्ष्मी इस समस्या से परेशान हो कर अपने पीहर के लिए नाराजगी के साथ रवाना हो गई. प्रथम गाँव में एक आदमी की अर्थी [ मुर्दा ] जा रही थी तो उस महिला संतोष ने पूछा कौन मरा, तो पता चला उसका नाम अमरा. फिर  दूसरें गाँव में पहुची तो उसको एक आदमी मिला जो स्वस्थ होकर मांग रहा था भीख, उस आदमी से पूछा की तेरा नाम क्या तो वो बोला धन्ना, फिर तीसरे गाँव आगे उसको एक लडकी मिली जो छाणा  [उपले गोबर से बनते ] बीन रही थी, तो उसको पूछा की तेरा नाम क्या तो लडकी ने बताया लक्ष्मी, नाम के अनुरूप कार्य नहीं बल्कि कर्म प्रधान फल होता हैं.
      फिर उस मनोविज्ञानी में छोटी सी कविता इस प्रकार से सुनाई !
"अमरा तो मरता देख्या, धन्ना  मांगता भीख,
लक्ष्मी तो छाणा विणती, अपने तो ठंठलपाल ही ठीक"