"पथरी" कैसे, क्यों बनती !

पथरी कैसे बनती हैं, उसकी कितनी जातियां हैं. और उनके लक्षण क्या क्या होते ? इस प्रकार का प्रश्न होना स्वभाविक होता हैं.

पथरी की व्याख्या - नये घड़े में रखें हुए स्वच्छ पानी में भी जैसे कुछ समय के बाद कीच या जमी बारीक़ रेती का पावडर दिखता उसी प्रकार से मनुष्य शरीर में बस्ती रूप में पथरी जम जाती हैं, 
जब आकाश में वायु और बिजली की अग्नि बाँध कर ओले बना देती हैं. वैसे ही बस्ती स्थान पर प्राप्त हुए वायु से युक्त पित्त जमा कर पथरी बना देते हैं.
 वृक्क में जब किसी कारण से यूरिक एसिड, युटेरस, आक्जेलेट्स इत्यादि लवण अधिक मात्राओं में उत्सर्जित होते हैं. तब मुत्रस्थ जलांश में इनका विलय होना कठिन हो जाता हैं. इसलिए उनका कुछ सूक्ष्म स्फटिक के रूप में गवीनी के उर्ध्व भाग में या बस्ती में अवक्षिप्त हो जाता हैं. और उनके चारो ओर लवण के कण संगठित होकर पथरी बन जाते हैं.
पथरी या अश्मरी को अंग्रेजी भाषा में 'कैलकुलस" कहते हैं. अश्मा [ पत्थर ] के समान कठिन होने से इस बीमारी को अश्मरी या पथरी कहते हैं.
पथरी की उत्पति में प्रकार भेद के कारण भी अनेक होते हैं.
तथापि

संशोधन का अभाव और आहार-विहार का विकार से ही ये दोनों प्रधान कारण सामान्यता मिलते हैं.

पंचकर्म के शरीर का संशोधन न करने वाले तथा कुपथ्य से रहने वाले मनुष्य का कुपित हुआ कफ मूत्र में मिलकर वस्ती में प्रविष्ट हो कर अश्मरी को पैदा करते हैं.

वस्तिगत, अश्मरी रोग का पूर्व रूप - वस्ती स्थान में पीड़ा, कष्ट से मूत्र का त्याग वस्तीशिर वृषण और शिश्न में वेदना मूत्रकृच्छ के कारण ज्वर और कमज़ोरी तथा मूत्र में उन्मत बकरे की गंध आती हैं.    

1श्लेष्माश्मरी  -

2. पित्ताश्मरी -


3.  वाताश्मरी -

4. शुक्राश्मरी -

 आधुनिक चिकित्सा शोध में तीन प्रकार की पथरी का वर्णन मिलता हैं.

1. ओक्सेलेड -

2. कैल्सराईड -

3. प्लुरिन  -


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