गुरुवार, 9 अक्तूबर 2014

ब्रहमचर्य

        ब्रहमचर्य का यौगिक अर्थ होता हैं, ब्रह्म का मतलब निर्माण, पैदा करना. चर्य या चर्या का मतलब आचरण होता हैं, भारतीय मनीषियों ने इस शब्द को एक इस्तेमाल उन शिष्यों के लिए जो शिक्षार्थी ज्ञान अध्ययन प्राप्ति के समय काम-क्रीडा से दूर रखने के लिए किया था. ब्रह्म की प्राप्ति के लिए वेदों का अध्ययन करना. वेद यानि ज्ञान प्राप्त करना. अर्थात शिक्षा को या कोई लक्ष्य हो जैसे भक्ति, कोई प्रतिज्ञा से प्राप्ति, दुश्मन से जितना, अथवा आविष्कार करना या कोई निर्माण करना जिससे चित का एकाग्रता एक बनी रहे और बुद्धिजीवी बन कर अपना लक्ष्य प्राप्त कर सके. ब्रह्मचर्य के बिना कोई भी कार्य सिद्ध नहीं हो सकता.
        प्राचीन काल में छात्रगण ब्रह्मचर्य की प्राप्ति के लिए गुरु के सानिध्य में वीर्य की रक्षा में करते हुए वेदाध्यन करते थे. इस कारण से इस शब्द का इस्तेमाल वीर्य की रक्षा में रूढ़ यानि प्रमाणिक हो गया. वीर्य रक्षा के प्रभाव से ही प्राचीन काल में  मनुष्य निरोगी, बलवान, हष्ट-पुष्ट, शूरवीर, बुद्धिमान, तेजस्वी, कान्तियुक्त, एक चित [ एकाग्रः ] बुद्धिमान होते थे.
       योगिजन जो योग साधना करतें वे ब्रह्मचर्य से ही अपने आप को थोड़े समय में भिन्न-भिन्न प्रकार से योगो की विद्यासिखकर अपने ज्ञान को बढाते थे, वीर्य रक्षा के कारण ही वो सभी मौसम में अपने तप को आसानी से कर सकते मौसम की प्रितिकुलता से कोई प्रभाव अपने शरीर पर नहीं पड़ने देते थे.
        ब्रह्मचर्य का नाश मतलब की नाना प्रकार की बीमारियों से मुकाबला करना, और अपना आत्म सम्मान खोना, जिससे सफलता कोसो दूर हो जाती और व्यक्ति समाज में पिछड़ जाता हैं.