सोमवार, 3 नवंबर 2014

नाडी - विज्ञान

आयुर्वेद अनादी, शाश्वत एवं आयु का विज्ञान हैं. इसकी उत्पति सृष्टि की रचना के साथ हुई . जिन तत्वों से सृष्टि की रचना हुई, उन्ही तत्वों से ही इसकी उत्पति हुई. रचना एवं क्रिया का संपादन शरीर की प्राकृत एवं विकृत अवस्था पर संभव हैं. मानव शरीर में पंच तत्व के साथ वात पित्त, और कफ के भी पांच भेदों के  आधार पर प्रत्येक दोष के पांच पांच भेद किये गये है, तथा इनके आधार शरीर में स्थान गुण एवं कर्म का वर्णन कर के प्राकृत कर्म बताये हैं. पर प्राकृत अवस्था जब तक समान रहती तो शरीर स्वस्थ रहता और जब विषम अवस्था रहती तो बीमारी की अवस्था रहती है. 
         वात      
       शरीर में स्थित वायु दोष के शरीर के उत्तमांग से मुलाधारक क्रमश पाच भेद किये हैं, जो निम्न प्रकार हैं. प्राण- मूर्धा में. 
उदान - उर प्रदेश में, 
समान-कोष्ट में,
 व्यान- सर्व शरीर में, 
अपान- मूलाधार में.
      इनमें महाभूतो की अधिकता को यदि ले तो प्राण वायु आकाश महाभूत-प्रधान, उदान अप महाभूत -प्रधान, समान तेजस महाभूत - प्रधान, व्यान वायु, महाभूत-प्रधान तथा अपान पृथ्वी महाभूत -प्रधान हैं.
           पित्त    
         शरीर के उत्तमांग से अधोभाग तक महाभूतो की प्रधानता से पांच भेद किये गये हैं.
आलोचक - नेत्र, तैजस महाभूत प्रधान.
साधक - हृदय, आकाश महाभूत - प्रधान 
पाचक - कोष्ठ, पृथ्वी तत्व - प्रधान 
रंजक - यकृत, प्लीहा अप महाभूत - प्रधान 
भ्राजक - सर्व शरीर गत त्वक् वायु प्रधान .
       कफ 
इसी प्रकार से कफ के भी पांच प्रकार निम्नलिखित है.
बोधक- जिव्हा में तैजस महाभूत - प्रधान.
क्लेदक - आमाशय में, अप महाभूत - प्रधान.
अवलम्बक - हृदय में, पृथ्वी महाभूत- प्रधान.
तर्पक - इन्द्रियों में, आकाश महाभूत - प्रधान.
श्लेषक - संधियों में, वायु महाभूत - प्रधान.      
     उपरोक्त सभी अनुभवी नाडीवैध्द्य के कर्म प्रधान चिकित्सा का हिस्सा होता हैं.