कमजोर पाचन = ज्ञान का अनुसरण ; आप ने देखा होगा की ज्ञान का अनुसरण सभी करते जहा तक ज्ञान का अहंकार हो उस समय वह ज्ञानी मानता है की मेरा ही ज्ञान सही है और दूसरा का ज्ञान गलत परन्तु ऐसा नही है .आज कल आपने देखा होगा की अंग्रेजी दवाई वाले कहते की हमारी एलोपेथी दवा माउथ डीजाल्न्विग है जो जल्दी घुल जाती और असर जल्दी करती है .इसी आधार पर होमियोपैथिक डाक्टर भी इसी सिद्धांतों के आधार पर चलते, चलाते है .परन्तु वास्तव में देखा जाय तो आप को बचपन से सिखाया जाता है की खाना चबाकर खाना चाहिए, कारण की खाना जल्दी पच सके, क्यों की हमारी जीभ में से उत्पन्न एमाइलेस नामक पाचक तत्व होता है .जो हमारे भोजन को पचाने में सहायता करता है .हम जितना भोजन को चबा चबा कर खायेंगे उतना ही भोजन जल्दी पचेगा .आप उन लोगो को देखिये जो लोग भोजन को जल्दी जल्दी के निवाला को निगलते उन की पाचनशक्ति कमजोर होती है ,कब्ज ,अपचन, गैस ,मुह में पानी या खट्टापन आना की शिकायत करते है जिस की मूल वजह यही होती की खाना चबाकर नही खाया जाता है .इसलिए आप अपना भोजन चबा चबा कर ही खाए जिससे मुह की लार ही खाते खाते भोजन को जल्दी पचा दे .
AAYURVED, MODREN, NUTRITION DIET & PSYCOLOGY गोपनीय ऑनलाइन परामर्श -- आपको हमारा परामर्श गोपनीयता की गारंटी है. हमारा ब्लॉग्स्पॉट, विश्वसनीय, सुरक्षित, और निजी है. एक उर्जावान, दोस्ताना, पेशेवर वातावरण में भौतिक चिकित्सा के लिए सर्वोत्तम संभव कार्यक्रम प्रदान करना है. "डॉ. रघुनाथ सिंह राणावत: OCD, HOCD और यौन संबंधी समस्याओं के लिए CBT/ERP विशेषज्ञ।"
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बुधवार, 4 जुलाई 2012
शुक्रवार, 27 जनवरी 2012
आहार का मनोविज्ञान
आहार का मनोविज्ञान
हम विचार करते की मेरा मन पसंद भोजन करता हुं , पूर्ण शुद्ध आहार लेता हुं, अच्छे होटल का खाना खाता हुं , हमारा सामाजिक भोजन अच्छा है, हमारे घर का बना खाना बढ़िया है, फिर भी में मेरे मित्र के समान बल वान व् बुद्धिमान क्यों नही, मेरा बेटा या मेरा भाई भीं क्यों नही, आदमी सोचता है की में मेरा मन पसंद भोजन ऐसे खींच लेता जैसे लोहा चुंबक को मगर हक़ीकत तो यह है की चुंबक लोहा को खिचता है, परन्तु हमे हमारे पांच स्वेदन शील इन्द्रियों का प्रभाव मन के उपर कैसा प्रभाव बना रखा उसका विचार करना होगा, और हमारा मन पाचन संस्थान के अनुसार भोजन लेता है या अवचेतन मन के दुआरा
हम विचार करते की मेरा मन पसंद भोजन करता हुं , पूर्ण शुद्ध आहार लेता हुं, अच्छे होटल का खाना खाता हुं , हमारा सामाजिक भोजन अच्छा है, हमारे घर का बना खाना बढ़िया है, फिर भी में मेरे मित्र के समान बल वान व् बुद्धिमान क्यों नही, मेरा बेटा या मेरा भाई भीं क्यों नही, आदमी सोचता है की में मेरा मन पसंद भोजन ऐसे खींच लेता जैसे लोहा चुंबक को मगर हक़ीकत तो यह है की चुंबक लोहा को खिचता है, परन्तु हमे हमारे पांच स्वेदन शील इन्द्रियों का प्रभाव मन के उपर कैसा प्रभाव बना रखा उसका विचार करना होगा, और हमारा मन पाचन संस्थान के अनुसार भोजन लेता है या अवचेतन मन के दुआरा
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